Thursday, October 4, 2012

‘भारंगम’ : एनएसडी का, एनएसडी के लिए, एनएसडी के द्वारा



गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर की 150वीं जयंती के नाम पर भारत सरकार गुजरे एक साल से भारत के तमाम सांस्कृतिक केन्द्रों व उपकेन्द्रों को खैरात बांटने में लगी हुई है। इसका नतीजा यह हुआ कि कुकुरमुत्ते की तरह  कई ऐसी संस्थाएं इस खैरात को लपकने के लिए उग आयीं और रविन्द्र नाथ टैगोर के नाम का ढिंढोरा पीटने लगीं, जिन्हें वास्तविक रूप से टैगोर से नहीं बल्कि सरकारी खैरात से मतलब था। भारतीय रंगमंच की प्रतिनिधि(?) संस्था कहे जाने वाले ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’(एनएसडी) ने भी इस बार होने वाले 14वें ‘भारत रंग महोत्सव’ (भारंगम) की थीम के लिए टैगोर की इसी 150वीं जयंती को चुना और टैगोर विशेष के नाम पर  ‘भारंगम’ में शामिल कुल 96 प्रस्तुतियों में टैगोर के जीवन और उनकी रचनाओं पर आधारित सिर्फ 14 प्रस्तुतियों को चुना (इसमें उद्घाटन प्रस्तुति, रतन थियम निर्देशित नाटक ‘द किंग ऑफ द डार्क चैंबर’ शामिल नहीं है)। आश्चर्य की बात तो यह है कि इन 14 प्रस्तुतियों में कुछेक प्रस्तुतियों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश प्रस्तुतियां केवल खैरात बटोरने की लीक पर ही चलती हुई नजर आयीं। कई लोगों के मन में प्रश्न उठ सकता है कि फिर ऐसी प्रस्तुतियों को इतने बड़े समारोह में शामिल कैसे कर लिया गया तो इसका जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि पिछले कई ‘भारंगम’ से यह बात स्पष्ट हो गयी है कि नाटकों की उत्कृष्टता और ‘भारंगम’ में कोई साम्य नहीं है। ‘भारंगम’ अब अपने कुछ खास लोगों के लिए एक ‘प्रोमोशनल इवेंट’ के रूप में तब्दील हो चुका है।
 इस 14वें भारंगम के उद्घाटन समारोह में केन्द्रीय मंत्री कुमारी शैलजा ने अपने उद्घाटन भाषण में ‘एनएसडी’ को भारत में एक बेहतर रंगमंचीय माहौल बनाने के लिए धन्यवाद देते हुए ‘एनएसडी’ को और प्रोत्साहन देने की और हरसंभव आर्थिक मदद देते रहने की बात दोहराई। क्या ‘एनएसडी’ से इतर भारत में  जो रंगमंच हो रहा है, वह रंगमंच नहीं है? क्या रंगमंच के सारे व्याकरण और सारी परिभाषाएं ‘एनएसडी’ ही तय करती है? बल्कि सच्चाई तो यह है कि यदि बेहतर और प्रतिबद्ध रंगकर्म कहीं हो रहा है, तो वह भारत के छोटे=छोटे शहरों व कस्बों में ही हो रहा है, जहां रंगमंच किसी सरकारी मदद पर नहीं, बल्कि जन सहयोग और कलाकारों व संस्कृतिकर्मियों की जिजीविषा तथा प्रतिबद्धता की वजह से जिंदा है।
  जिस समय देश की राजधानी में एशियाई रंगमंच का कुंभ कहा जाने वाला ‘भारत रंग महोत्सव’ अपने 14वें संस्करण में मशगूल था, तब इसी के आसपास बिहार के एक शहर बेगुसराय में जन सहयोग और जनता की सीधी भागीदारी से पांच दिन का ‘रंग-ए-माहौल’ नाम से एक नाट्य समारोह आयोजित कर युवा रंगकर्मी प्रवीण कुमार गुंजन एक बेहतर रंगमंचीय वातावरण तैयार कर रहे थे। रायगढ़ में इप्टा 18 साल से राष्ट्रीय नाट्य समारोह मना रही है और रंगमंच में एक सकारात्मक भूमिका अदा कर रही है। तब ऐसे में क्या हमें इस योगदान को योगदान नहीं कहना चाहिए ? दरअसल ‘एनएसडी’ अघोषित तौर पर देश में एक ऐसा माहौल तैयार करने में लगी हुई है, जहां रंगमंच एनएसडी का, एनएसडी के लिए एनएसडी के द्वारा हो।
 टैगोर की 150वीं जयंती पर फोकस 14वें ‘भारंगम’ में टैगोर के जीवन और उनके रचनाकर्म पर आधारित 14 नाट्य प्रस्तुतियों के अलावा उनके कृतित्व पर एनएसडी  परिसर में एक चित्र प्रदर्शनी भी लगायी गयी। अंतर्राष्ट्रीय खंड को सामयिक पोलिश रंगमंच पर केंद्रित करते हुए ‘भारंगम’ में तीन पोलिश नाटक ‘ग्रोटोवस्की-एन अटेम्प्ट टू रिट्रीट’, ‘कोरस ऑफ वूमेन’ और ‘इन द नेम ऑफ जकूब एस.’ के अलावा अन्य विदेशी नाटकों में श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैण्ड, चीन, इटली, जापान, पाकिस्तान, इजराइल, तुर्की, अफगानिस्तान, नेपाल, और बांग्लादेश की प्रस्तुतियों को शामिल किया गया।
 अपने कलात्मक दृश्य प्रभाव के लिए दुनिया भर में मशहूर रंग निर्देशक रतन थियम की प्रस्तुति ‘द किंग ऑफ द डार्क चैम्बर’ से इस महोत्सव की शुरुआत हुई। हालांकि इस बार भी ‘एनएसडी’  की आदत बन चुकी गलतियों की वजह से दर्शकों की भारी संख्या उद्दघाटन समारोह देखने से वंचित रह गयी। इसका प्रमुख कारण रहा प्रेक्षागृह की क्षमता से दुगनी मात्रा में आमंत्रण पत्र बांटना। दर्शकों के भारी विरोध की वजह से इस बार प्रेक्षागृह के बाहर एक अलग ही नाटकीय माहौल पैदा हुआ। हालांकि बाद में रतन थियम के नाटक की दुबारा प्रस्तुति की घोषणा से स्थिति नियंत्रण में आयी। टैगोर के नाटक ‘राजा’ पर आधारित नाटक ‘द किंग ऑफ द डार्क चैंबर’ में रतन थियम सदा की तरह ही फिर एक बार अपनी रंगत में दिखे। रतन थियम के नाटक की भाषा मणिपुरी होते हुए भी, मणिपुरी न जानने वाले दर्शकों के रंगास्वाद में कहीं से भी कोई अवरोध उत्पन्न नहीं हुआ।  उनके नाटकों में विजुअल लैंग्वेज इतनी प्रभावी होती है कि दर्शक मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह पाता। टैगोर के दर्शन एवं व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालता यह नाटक मंच पर एक नए महाकाव्य को घटित करता है। नाटक का एक-एक दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो हमारी आंखों के सामने किसी कवि की कविता दृश्य रूप में सजीव हो उठी हो। नाटक में अभिनेताओं की दैहिक भाषा, नृत्यमूलक गतियां, पार्श्व संगीत, प्रकाशकीय रंगों का जादुई आलोक,  वस्त्र योजना और हर क्षण चमत्कृत करने वाली दृश्य संरचना एक ऐसे रंग अनुभव का सृजन करती है, जिसकी अमिट छाप एक लंबे समय तक दर्शकों के  दिलो-दिमाग पर रहेगी। रंगमंचीय सीमाओं की वर्जनाओं को तोड़ने वाले रतन थियम किसी भी लिखित टेक्स्ट को एक ऐसा कलात्मक और सांस्कृतिक स्वरुप देते हैं जो अपने तरह का एक अलग ही रंग संसार सृजित करता है  और आधुनिक भारतीय रंग भाषा को एक नया आयाम देता है, चाहे इब्सन लिखित उनका ‘व्हेन वी डेड अवेकन’ हो या ‘हे नुंगशिबी पृथ्वी’ हो या ‘नाइन हिल्स वन वैली’ हो या अन्य नाटक सबमें एक नया रंग आस्वाद मिलता है। टैगोर लिखित इस प्रतीकात्मक नाटक ‘किंग ऑफ द डार्क चैम्बर’ में भी रतन थियम एक नयी रंग भाषा का सृजन करते हुए एक मौलिक  कलात्मक, काव्यात्मक चमत्कार को घटित करते हैं।
   इस आयोजन में कई ऐसे निर्देशकों की प्रस्तुतियों को भी शामिल किया गया जिनकी प्रस्तुतियों को पहले मंचन के दौरान ही भारी आलोचना का दंश झेलना पड़ा। इनमे नीलम मान सिंह चौधरी और रोबिन दास जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं, जो क्रमशः एनएसडी रंगमंडल की प्रस्तुति  ‘ब्लड वेडिंग’ और ‘स्याह चन्द्र का फ्यूज बल्ब’ के साथ आमंत्रित थे। ऐसी प्रस्तुतियों की संख्या पिछले साल की भांति इस बार भी  ज्यादा रही। इसके बरक्स इस बार बड़े और वरिष्ठ नामों के अपेक्षा युवा निर्देशकों का काम ज्यादा उर्जावान नजर आया। ऐसी ही एक प्रस्तुति थी प्रसिद्द साहित्यकार गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ की कहानी ‘समझौता’ पर आधारित एक पात्रीय नाटक ‘समझौता’। सुमन कुमार के इस नाट्य रूपांतरण को निर्देशित किया था युवा निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन ने और इसे अपने जीवंत अभिनय से संवारा उर्जावान अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी ने। इस नाटक के असर का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नाटक के अंत में दर्शक खड़े होकर  लगातार ताली बजाते रहे, आखिरकार उद्घोषक को अपनी उद्घोषणा के लिए निवेदन करना पड़ा कि दर्शक थोड़ी देर के लिए ताली बजाना रोक लें, यहां तक कि दर्शकों की मंत्रमुग्धता कम करने के लिए मानवेंद्र को नाटक की समाप्ति के बाद उनका अभिवादन लेटकर भी करना पड़ा। मानवेंद्र इस नाटक में अभिनय की एक ऐसी ऊंचाई छूते हैं जहां दर्शकों का साक्षात्कार एक सम्पूर्ण अभिनेता से होता है। इस नाटक में मानवेंद्र अभिनय के सारे अवयवों को एक साथ लेकर मंच पर उतरते हैं और उसे बड़ी तन्मयता के साथ साधते है।
 इसके साथ ही पिछले कुछ सालों से अपनी ओर ध्यान खींचने वाले युवा निर्देशकों में मोहित तकलकर (गजब कहानी), हेस्नम तोम्बा(हंग्री स्टोन), सुनील शानबाग(स्टोरीज इन ए सांग) और मनीष मित्र(जर्नी टू डाकघर) ने भी इस बार इस महोत्सव में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। मोहित तकलकर इस बार नोबल पुरस्कार विजेता जोस सरामागो के उपन्यास ‘द एलिफेन्ट्स जर्नी’ पर आधारित नाटक ‘गजब कहानी’ के साथ उपस्थित थे। यह नाटक एक हाथी के भारत से लिस्बन और लिस्बन से वियेना तक की यात्रा को कहानी का आधार बनाते हुए  वर्ग संघर्ष और धर्मान्धता की पड़ताल बड़ी संजीदगी के साथ करता है। रंगमंच की आंतरिक शक्तियों पर दृढ़ता से विश्वास करने वाले मोहित तकलकर अपनी इस  प्रस्तुति में दृश्य संयोजन के लिए  मंच विधान, प्रकाश और मंच सामग्रियों  का सांकेतिक और बिम्बात्मक प्रयोग करते हैं, जो कथ्य को और मजबूती प्रदान करता है। मोहित प्रस्तुति के दौरान ही नहीं बल्कि प्रस्तुति के अंतिम दृश्य  में भी प्रभाव छोड़ते है। वे नाटक के अंत में खाली मंच पर एक ऐसा शून्य सृजित करते हैं जो नाटक के बाद भी काफी लंबे समय तक कायम रहता है।
   हेस्नम तोम्बा मणिपुर के ख्यातिलब्ध निर्देशक एच. कन्हाईलाल और अभिनेत्री सावित्री हेस्नम के पुत्र हैं। रंगमंच उनके रक्त में है, विरासत में मिले इस रंगमंचीय कौशल को अपने अनुभव से सींचते हुए हेस्नम तोम्बा अपनी प्रस्तुतियों में अपनी  मौलिकता को मुखरित करते हैं। टैगोर की कहानी ‘क्षुधितो पाषाण’ पर आधारित उनका नाटक ‘हंग्री स्टोन’ इस मौलिकता का एक अच्छा उदाहरण है। वे रंगमंचीय शिल्प के स्तर पर अपने पिता की परंपरा का निर्वाह तो करते हैं, लेकिन रंग भाषा के स्तर पर बिलकुल मौलिक रहते हुए। अपनी पिछली प्रस्तुतियों ‘कॉटन 55 पालिएस्टर 84’, ‘सेक्स मारैलिटी एंड सेंसरशिप’ और ‘ड्रीम्स आफ तालीम’ से दर्शकों को  प्रभावित करने वाले निर्देशक सुनील शानबाग इस बार भी अपनी प्रस्तुति ‘स्टोरीज इन ए  सांग’ के साथ अपने रंग में दिखे। सुनील के इस बार के नाटक का विषय था-संगीत। इस सांगीतिक प्रस्तुति में  सुनील ने आधुनिक, शास्त्रीय और लोकपद्धतियों का जो कोलाज रचा, वह एक बिलकुल नए अंदाज में मंच पर दीखता है। सुनील की खासियत है कि वे अपने नाटक के लिए विषय का चुनाव बड़ी सतर्कता के साथ करते है और उसी में से वे नाट्य प्रस्तुति के लिए उसके शिल्प और शैली को निर्धारित करते हैं। भारतीय रंगमंच में अनेक शैलियां प्रचलित हैं, लेकिन यहां सुनील की यह प्रस्तुति रंगमंच का इस्तेमाल कजरी, ठुमरी, दादरा, ख्याल इत्यादि संगीत शैलियों का इतिहास बताने के लिए करती है। 
 फिल्मी सितारों से सजी प्रस्तुतियां इस बार भी भारंगम में मौजूद थीं। कल्लू मामा के नाम से मशहूर अभिनेता व निर्देशक सौरभ शुक्ला नील साइमन के ‘लास्ट ऑफ द रेड हॉट लवर्स’ पर आधारित नाटक ‘रेड हॉट’ के साथ उपस्थित थे। इस नाटक में सौरभ शुक्ला मुख्य भूमिका में थे। सौरभ जहां इस नाटक में निर्देशक के तौर पर सूक्ष्मतर गुत्थियों को सामने लाने में सफल रहे वहीं अभिनेता के तौर पर भी बेहद उर्जावान और जीवंत लगे। भारतीय रंगमंच में आधुनिकता के जनक मोहन राकेश के कालजयी  नाटक ‘आधे अधूरे’ को लेकर लिलेट दुबे भी इस बार ‘भारंगम’ में शामिल हुईं। रंगमंच व फिल्म अभिनेता मोहन अगाशे और लिलेट दुबे अभिनीत यह नाटक भी एक स्तरीय रंग अनुभव के आस्वाद की वजह बना। ‘बैंडिट क्वीन’ फेम सीमा विश्वास भी टैगोर की रचना ‘स्त्रीर पात्र’ में अपने एकल अभिनय के साथ उपस्थित थीं। कुछ और सराहनीय प्रस्तुतियों  में ‘ग्रोटोवस्की- एन अटेम्प्ट टू रिट्रीट’(पोलैंड), ‘एक्टर्स आर नॉट अलाउड’ (पुद्दुचेरी विश्वविद्यालय), पेकिंग ओपेरा (चीन), द गोल्डन ड्रैगन’ (इंग्लैण्ड), प्रिया बावरी(वामन केंद्रे), ‘आज रंग है’ (गोपाल तिवारी, पूर्वा नरेश) रहीं।
हाल के वर्षों में नक्सल गतिविधियों के लिए चर्चित छत्तीसगढ़ के बस्तर का एक और भी चेहरा है जो इसकी इस छवि के ठीक विपरीत है। संगीनों की आवाज से दूर आदिवासी समूह का एक ऐसा निनाद जहां जमीन से उठते स्वर सारे आकाश को गुंजायमान कर रहे हैं और सांझी तहजीब और अमन का सन्देश बुलंद कर रहे हैं, यहां बात हो रही है इस बार के ‘भारंगम’ का विशेष आकर्षण रहा आदिवासिओं के नृत्य संगीत और वादन के समूह ‘बस्तर बैंड’ की। ‘बस्तर बैंड’ की इस प्रस्तुति ने आदिवासी परंपरा में प्रयुक्त उन दुर्लभप्राय वाद्य यंत्रो और नृत्यों से एक ऐसा कोलाज रचा जो वाकई विस्मयकारी था। ‘बस्तर बैंड’ मूलतः बस्तर के आदिम जनजातियों की प्रस्तुति है, जिसमें गाथा भी है, आलाप भी है गायन भी है और नृत्य भी। इस ‘बस्तर बैंड’ में बस्तर के आदिवासी समूह के लगभग विलुप्त हो गए 40 से अधिक वाद्य यन्त्र है, जिसमें  तार से बने, मुँह से फूंक कर बजाने वाले और हाथ व लकड़ी से बजाने वाले यंत्र शामिल हैं। ‘बस्तर बैंड’ सही मायने में लुप्त होते पारंपरिक, लोक और आदिवासी वाद्यों की सामूहिक अभिव्यक्ति है। इस बैंड को देखते हुए यही आशंका बार-बार मन में उठती है कि इस खरीदने-बेचने की रेलमपेल में कहीं इसे अनगढ़ से सुगढ़ बनाने के चक्कर में इस पर बाजार की गिद्ध दृष्टि न पड़ जाए।
 विगत कुछ सालों से ‘भारंगम’ का एक अभिन्न अंग बन चुका ‘फूड हब’ इस बार भी पूरे महोत्सव के दौरान आकर्षण का केंद्र बना रहा। मंचीय प्रस्तुतियों के इतर यह  ‘फूड हब’ हर शाम बाउल, ग़जल, कव्वाली, सूफी और अन्य  सांगीतिक कार्यक्रमों को प्रस्तुत करता रहा, इसके साथ ही यहां वैसे लोग भी नजर आए जो हॉउसफुल और सर खपाऊ व उबाऊ नाटक को बीच में ही छोड़कर चाय व काफी की चुस्कियों के साथ अपने  दिल और दिमाग हल्का करने को ज्यादा तरजीह देते हैं। 
  इस बार भी ‘भारंगम’ की ज्यादातर प्रस्तुतियों का स्तर औसत ही रहा। प्रयोग के नाम पर कुछ भी करते नाटकों की संख्या इस बार भी ज्यादा थीं। कुल 96 प्रस्तुतियों में आधी प्रस्तुतियां भी ऐसी नहीं रहीं, जिन्हें बेहतरीन प्रस्तुति कहा जा सके। यानी इस बार भी तमाम झूठे वायदों और कवायदों की लीपापोती करने तथा ‘स्तरीय रंगमंच’ के नाम पर कुछ भी दिखाने के लिए याद किया जाएगा, इस बार का ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ द्वारा प्रायोजित 14वा ‘भारत रंग महोत्सव’।  


(भारंगम 2012 पर यह रिपोर्टनुमा आलेख लखनऊ से प्रकाशित मासिक समाचार पत्रिका 'सामना' के फ़रवरी 2012 अंक में प्रकाशित हो चुका है. लेकिन इस पर पर्याप्त ध्यान न जा पाने की वजह से मैं इसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ ताकि यह वेब पर भी उपलब्ध हो सके.)




  
  

Tuesday, January 10, 2012

‎14वां भारत रंग महोत्सव : गलतियाँ वही शुरुआत नयी





हर आदमी अपनी पिछली गलतियों से कुछ सीखता है और उसे दोबारा न दोहराने की  कोशिश करता है लेकिन, भारत ही नहीं वरन एशिया महाद्वीप में अपना शीर्ष स्थान रखने वाली नाट्य संस्था राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय बार बार अपनी गलतियों को दोहरा कर गर्वित महसूस करती है. ८ जनवरी को दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) द्वारा आयोजित १४वें भारत रंग महोत्सव(भारंगम)  का उद्घाटन समारोह देख कर उपरोक्त  पंक्ति लिखने को विवश होना पड़ रहा है. एनएसडी ने पछले साल की भांति इस साल भी इतने बड़े समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम के लिए करीब ६०० लोगों की क्षमता वाले कमानी सभागार को ही चुना, और क्षमता से लगभग दुगनी संख्या में आमंत्रण पत्र बांटकर सभागार के अंदर नाटक और सभागार के बाहर एक नाटक की स्थिति पैदा की. यही स्थिति पिछले साल के भारंगम में भी देखने को मिली थी. फिर भी एनएसडी ने उससे कोई सबक न लेते हुए दोबारा उसी जगह को चुना जबकि इसके लिए किसी और जगह का भी चुनाव किया जा सकता था.
५.३० बजे से तय कार्यक्रम में सभागार ५ बजे ही हाउस फूल हो जाता है और सैकड़ों की तादाद में दर्शकों, रंगकर्मियों, छात्रों व मिडियाकर्मियों को उस अव्यवस्था का शिकार होने और झेलने के लिए छोड़ दिया जाता है. धीरे धीरे बाहर खड़े लोगों के सब्र का बाँध टूटने लगता है और उनका विरोध हंगामें की शक्ल अख्तियार कर लेता  है. सभागार के अंदर मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा, चर्चित अभिनेत्री शर्मीला टैगोर, रानावि की अध्यक्षा अमाल अल्लाना व एनएसडी की निर्देशिका अनुराधा कपूर के भाषण चल रहे थे और सभागार के बाहर दर्शकों का हुजूम “साड्डा हक इत्थे रख”, भारत माता की जय,  “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं देखना है जोर कितना इनके दरवाज़े में है” जैसे कई गीतों और बोलों से अपने विरोध को स्वर देने में लगा हुआ था. डेढ़ घंटे से इंतज़ार में खड़े दर्शकों के मन में यही लालसा थी कि एक नयी रंग भाषा का सृजन करने वाले विख्यात रंग निर्देशक रतन थियम का नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” को किसी तरह देख लें, लेकिन जैसे जैसे नाटक शुरू होने का समय निकट आ रहा था वैसे वैसे दर्शकों में विरोध और मायूसी का भाव साथ साथ आ रहा था. आखिरकार कीर्ति जैन के इस आश्वासन पर हंगामा थमा कि नाटक का एक और शो ९ बजे से रखा गया है और इस तरह, बाहर खड़े दर्शकों को एक चमत्कृत करने वाला रंगमंच देखने का सपना साकार हुआ.
गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर लिखित व रतन थियम निर्देशित नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” का ये मंचन वाकई अद्भुत था, अपने जादुई रंग शिल्प एवं भाषा के लिए विश्व ख्याति प्राप्त रंग निर्देशक रतन थियम के इस नाटक का एक एक दृश्य कविता की  तरह था. रंगमंचीय सीमाओं की वर्जनाओं को तोडने वाले रतन थियम की खासियत है कि वो टेक्स्ट को आत्मसात कर लेते हैं और आधुनिक भारतीय रंग भाषा को एक नया आयाम देते हैं, चाहे इब्सन लिखित उनका “व्हेन वी डेड अवेकन” हो या “हे नुंगशिबी पृथ्वी” हो या “नाइन हिल्स वन वैली” हो या अन्य नाटक सबमें एक नया रंग आस्वादन मिलता है.
टैगोर लिखित इस प्रतिकात्मक नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” में भी रतन थियम एक नयी रंग भाषा का सृजन करते हैं.
बहुत पहले एक सेमीनार में भारतीय रंगमंच की चुनौतियों पर बोलते हुए रतन थियम ने मनोरंजन के अन्य साधन सिनेमा और टेलिविज़न के सामानांतर रंगमच की  शक्तियों को उजागर करते हुए कहा था, कि रंगमच को कभी भी सिनेमा और टेलेविज़न की नक़ल न करके उसकी अपनी शक्तियों पर दृढ़ता से विश्वास  करना होगा और रंगमंच पर चमत्कार पैदा करना होगा. और चमत्कार हमें सचमुच इनके नाटकों में दीखता है. नाटक “किंग ऑफ द डार्क चैम्बर” में रतन थियम एक बार और उस चमत्कार को रचते हैं, और ऐसे रचते हैं कि मणिपुरी भाषा होने के बावजूद दृश्यों पर से नज़र नहीं हटती और दर्शक अपलक उसमे बहता हुआ एक नयी रंग अनुभूति से सराबोर हो जाता है. टैगोर के दर्शन एवं व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालता ये नाटक मंच पर एक नए महाकाव्य को घटित करता है.
इस १४वें भारत रंग महोत्सव के पहले दिन मंचित होने वाला एक अन्य नाटक था “पापा लादेन”. जिबरिश में खेले गए इस नाटक को निर्देशित किया था एनएसडी से इसी साल पास आउट छात्र सुमन मल्लिपेद्दी ने. एक मध्य वर्गीय परिवार की खुशियों को  चुटीले अंदाज़ में समेटने कि कोशिश करता ये नाटक रानावि के डिप्लोमा प्रस्तुति के अंतर्गत मंचित किया जा चुका है.

 (यह आलेख जन सन्देश टाईम्स, लखनऊ  में प्रकाशित हो चुका है)


            
     

Friday, March 25, 2011

व्यक्त वाक्य और एक अनौसत फिल्म


Leonardo DeCaprio और Ben Kingsley के औसत अभिनय और Martin Scorsese के औसत निर्देशन वाली Shutter Island एक औसत फिल्म ही है, लेकिन बावजूद इसके
यह कुछ विशेष वाक्य रचती है दरिंदगी, विक्षिप्तता, विरोध, भय और हिंसा के विषय में. और इस तरह यह फिल्म कुछ वाक्यों के माध्यम से अपने औसतपन से एक हद तक मुक्त होती है.
प्रस्तुत है इस फिल्म से ऐसे ही कुछ वाक्य....

  • जब तुम किसी दरिन्दे को देखते हो तब तुम्हें उसे रोकना ही चाहिए.
  • कुछ हद तक विरोध है बचने की भावना
  • दरिंदगी है होश में न रहना .
  • घाव दरिंदगी को जन्म दे सकते है.
  • सबसे बदतर क्या होता है एक दरिन्दे की तरह जीना या एक भले आदमी की तरह मर जाना
  • परमेश्वर ने हमें हिंसा दी ताकि हम उसे बरते उसके प्रति आदर स्वरूप
  • लोग कहते हैं कि आप पागल है और इस पर आपका विरोध यह साबित करता है कि वे जो कह रहे है सच है
  • बहुमूल्य बातें ही गलत समझी जाती हैं

Sunday, February 13, 2011

एक अपारंपरिक तस्वीर के सार्वभौमिक मायने


प्रस्तुत तस्वीर दक्षिण अफ़्रीकी फोटोग्राफर JODI BIEBER की है और इसे 2010 के
प्रतिष्ठित वर्ल्ड प्रेस फोटो अवार्ड से सम्मानित किया गया है.यह तस्वीर बीबी आयसा
नाम की एक अफ़गानी स्त्री की है जिसके नाक और कान उसके पति ने काट लिए थे
क्योंकि वह उसे छोड़कर चली गयी थी और इस अर्थ में यह तस्वीर उस पुरुष की मर्दानगी नहीं उसकी दिमागी नपुंसकता को उजागर करती है.

9 अगस्त 2010 के TIME के आवरण पर भी अवतरित यह तस्वीर लगभग हर अफ़गानी स्त्री की पीड़ा और भावनायें व्यक्त करती है.

इससे पूर्व भी 2002 में नेशनल जिओग्राफिक के लिए ली गई छायाकार व पत्रकार
STEVE MCcURRY की सरबत ग़ुला(फूलो का शरबत) नाम की एक देहाती, अफ़गानी लड़की की तस्वीर युद्ध की विभीषिका के बीच अपनी बहुत सुन्दर चमकती हुई आखों के लिए सारी दुनिया में जानी गई थी.

और अब यह प्रस्तुत तस्वीर जिसने एक बार फिर अपनी अपारंपरिक सुन्दरता के कारण
सबका ध्यान आकर्षित किया है, ऐसा क्यों है इस पर इसके रचयिता JODI BIEBER
कहते हुए... Women in situations like that are almost always portrayed as vulnerable in this one AISHA is looking quite
defiant...

यह तस्वीर सुन्दर है इसलिए क्योंकि इसका स्रोत अपनी आन्तरिकता और स्व में
अत्यंत प्रबल है, यह चित्र नितांत अपारंपरिक होते हुए भी उन मूल उत्सों से आया हुआ लगता है जहाँ सारी कलायें खुद को स्थानीय होते हुए भी एक सार्वभौमिकता
में व्यक्त करती हैं और यही इसकी सार्थकता भी है...

Saturday, February 12, 2011

ये सर्दियाँ कुछ सरल हो गई थी, जब एक बेतरह सर्द मौसम में आरंभ हुआ
इस वर्ष का भारतीय रंग महोत्सव अपनी अंतिम और मूक प्रस्तुति INHABITED
GEOMETRY के साथ समाप्त हुआ, इस दरमियान ज्यादातर बौद्धिक प्रपंच से भरी
कलाबजिया हुई या प्रोजेक्ट्स या कोरियोग्राफियन मंचीय दुरूपयोग या रूढ़ रंगकर्म
और इस दरमियान ही मानव कौल की पार्क, लुसियन दुबे की सलाम इंडिया,
सुनील शानबाग की ड्रीम्स आव् तालीम, हेसनम तोम्बा की समानद्रबा मामी,
गौरी रामनारायण की मैथमैजीसियन,ज़िया मोह्येद्दीन की ख्वाबों के मुसाफिर,
ज्योतिष एम. जी.की सागर कन्या और अलेक्सी कुज्हेल्न्य की आल अबाउट लव
जैसी कुछ शानदार प्रस्तुतियाँ भी हुई, यह हर बार की ही तरह था, जहाँ
बहुत कुछ रद्द करते हुए कुछ न कुछ बेहतर हाथ आता ही रहा है, लेकिन यहाँ
बस तथ्यों, गुणों और दोषों को क्रमवार सजा भर देना मकसद नहीं है और न ही किसी
ज्ञान व सुचना आधारित विवेचन में उलझना या उलझाना. यहाँ बस कुछ
असहमतियाँ है और कुछ दुःख कि कैसे वे रंगमंच को एक सीमित, जटिल और
विलासिता की वस्तु में तब्दील कर रहे है, क्यों वे एक तय परिवेश में खुद
को ध्वस्त कर रहे हैं जबकि वे कुछ विस्तृत, कुछ सरल और कुछ प्रतिबद्ध
होकर सबके लिए प्रासंगिक और उपलब्ध हो सकते हैं........

....और इस सबसे गुज़रते हुए हम कैसे इस तरह के रंगमंच से एक आत्मीय
और सारगर्भित सम्बन्ध कायम कर सकते जो खुद जुड़ना नहीं चाहता,
जबकि वह सीधे-सीधे जुडाव और संवाद का माध्यम रहा है कम से कम अब तक तो,
यह परम्परा आगामी कल में भी बनी रहे इस पर सोचना सिर्फ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
का ही काम नहीं है ये जानते हुए भी ये तो कहा ही जा सकता है कि इस पर सोचना
उसका एक दायित्व है रंगकर्म से जुड़े उसके और भी कई अन्य दायित्वों कि तरह.....

Calander

अंधेरे में

मुक्तिबोध की कालजयी कविता 'अंधेरे में' के प्रकाशन का यह पचासवाँ वर्ष है। इस आधी सदी में हमने अपने लोकतंत्र में इस कविता को क्रमशः...